दूर कंही एक आस जगी है,
नन्ही सी मुस्कान खिली है ।
उसके कोमल से चहरे पर ,
खुशियों की सौगात लगी है।
उसके मुख मंडल की लाली ,
फूलो को सरमाती है।
उसके योवन की वह काया,
मन मन्दिर सजाती है।
पहली बार मिला था उसको,
तब ऐसा एहसास नही था ।
मई तो ख़ुद को भूल चुका था,
याद दिलाई थी वह मुझको।
उसने मेरे जीवन में उर्जा का संचार किया है,
उसने मेरे सपनों को एक नया आकर दिया है।
साथ में उसके रहने से अब ,
मन में एक विशवास जगा है।
उसके नव जीवन में अब,
रंग भरने को जी करता है।
उसकी खुशिया देख कर,
खुश रहने को जी करता है।
जग की साड़ी खुशिया ,
दमन में उसके कर दू,
दुःख के बदल से उसको ,
दूर कंही ले उड़ चलू.
acchi koshish hai...
जवाब देंहटाएंaise hi likihte rahiye hamari subhkaamna aapke saath hai...
saprem
ambrish singh baghel